पक्षपात,जाती,धर्म आदि. का प्रभाव लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं से कम होता हैं !

कृपया नोट करें कि कुछ हद तक तरफदारी या पक्षपात करना मानव में स्वाभाविक है लेकिन हमारे सिस्टम बिना कोई पक्षपात के बनाये जा सकते हैं |

 

A. वे तत्व जो निर्णय करते हैं कि कोई पक्षपात होता है कि नहीं हैं -

1. उपलब्ध उम्मीदवारों की तुलनात्मक अच्छाई या बुराई -

 

हालाँकि 95% लोग ये कहेंगे कि वे पक्षपात नहीं करते,लेकिन यदि उनके यहाँ के उम्मीदवार आपसी तुलना में उतने ही बुरे या उतने ही अच्छे हैं,तो पक्षपात प्रचलन में आता है |

 

मान लीजिए कि आपको बाहर खाना पड़ जाये और सभी होटल एक जितनी ही खराब हैं और उन होटलों में से एक आपके रिश्तेदार की है,तो आप अपने रिश्तेदार का होटल जाना पसंद करेंगे,ये सोच कर कि शायद रिश्तेदार अच्छे बर्ताव करेगा और अच्छा खाना देगा | लेकिन यदि गैर-रिश्तेदार की होटल बाकी होटलों से कई अच्छी है और आपके रिश्तेदार के होटल से भी बहुत अच्छी है,तो लोग वो ही होटल जाना पसंद करेंगे |

ये ही स्तिथि वोट देते समय,कर्मचारियों को चुनने के समय भी आ सकती है |

 

2. पक्षपात की सम्भावना चुनने वाले व्यक्ति के विवेकाधीन शक्ति (स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार) के बढ़ने से बढ़ता है और पक्षपात की सम्भावना अधिकारी के मिली-भगत बनाने के अवसर बढ़ने से भी बढ़ता है -

यदि चुनने वाले / वोट देने वाले व्यक्ति के पास स्वतंत्र निर्णय करने के अधिकार हैं और मिली-भगत बनाने के अवसर हैं,तो अधिक सम्भावना है कि वो व्यक्ति अपना पक्षपात दिखायेगा |

एक मुख्यमंत्री अपना पक्षपात दिखा सके अपने रिश्तेदारों,जाती वाले,रिश्तेदारों आदि को चुन कर इसकी अधिक सम्भावना है- एक आम-नागरिक की तुलना में—- क्योंकि मुख्यमंत्री के पास स्वतंत्र निर्णय लेने के अधिक अधिकार हैं |

सुप्रीम-कोर्ट का जज अपने रिश्तेदार के लिए एक मंत्री को जनता का वकील (सरकारी वकील) बनाने की सिफारिश करने के लिए कहेगा और मंत्री सुप्रीम-कोर्ट के जज को अदालती मामलों में अपने रिश्तेदारों का पक्ष में फैसला दिलवाने के लिए कहेगा |

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हमेशा आज के सिस्टम से शुरुवात करनी चाहिए | यदि आप आज का सिस्टम देखेंगे,तो आप पाएंगे कि जनता के नौकरों के हमेशा अपने स्वार्थ होते हैं | और जनता वही नौकरों के लिए वोट देती है,जिनके स्वार्थ जन-समूह के स्वार्थ के विरुद्ध नहीं जाते |

 

B. अल्प-लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं में,जन-समूह शीर्ष के कुछ जनता के नौकरों के पक्षपात को रोक नहीं सकते और शीर्ष के कुछ लोग गैंग बना लेते हैं और जन-समूह को लूटते हैं |

ये था आज के अल्प-लोकतान्त्रिक,अलोकतान्त्रिक तरीकों के बारे में,जो दुर्भाग्य से हमारे पास आज हैं |

अभी, लोकतान्त्रिक प्रक्रियों में भी कुछ पक्षपात और स्वार्थ होता है,लेकिन ये पक्षपात एक दूसरे को काट देते हैं और जो स्वार्थ आपस में समान रूप से विद्यमान हैं,वे उभर के आते हैं और वे ही लागू किये जाते हैं | ये स्वार्थ जन-समूह के स्वार्थ के विरुद्ध नहीं होते |

 

यदि लोकतांतिक प्रक्रियाएँ लागू हैं और मुख्यमंत्री,प्रधानमंत्री जैसे जनता के नौकर अपने रिश्तेदारों,मित्रों आदि की तरफदारी करते हैं,तो जो जन-समूह को इससे नुकसान होता है,वे आपस में मिलकर उस पक्षपात करने वाले जनता के नौकर को एक निष्पक्ष व्यक्ति से बदल देंगे | इसीलिए,लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं में,शीर्ष के लोग जन-समूह को लूट नहीं सकते |

छोटे स्तर पर,आप लोकतंत्र को एक परिवार की तरह से समझ सकते हैं | परिवार के सदस्य अपने रुचियों को बताते हैं और फिर परिवार का मुखिया निर्णय लेता है,बहुमत परिवार के सदस्यों के रूचि के अनुसार | इसी प्रकार होता है देश का लोकतान्त्रिक सिस्टम |

 

C. राष्ट्रिय हित की बात

असल में,ऐसा कोई भी परिस्थिति नहीं है,जब कोई बात या चीज जनसँख्या के एक बड़े वर्ग को फायदा पहुंचायेगी और राष्ट्र के हित को नुकसान पहुंचायेगी |

 

यदि कोई इस तरह का दावा करता है,तो उसे कोई विशेष ड्राफ्ट जैसे `पारदर्शी शिकयत / प्रस्ताव प्रणाली`,राईट टू रिकाल-जिला शिक्षा अधिकारी,राईट टू रिकाल-प्रधानमंत्री आदि का संदर्भ देना चाहिए और वो पूरी परिस्थिति बतानी चाहिए जिसमें ये लोकतान्त्रिक ड्राफ्ट राष्ट्र हित को नुकसान पहुंचाएंगे | वो व्यक्ति परिस्थितियां देगा और एक-एक करके आपको उनको व्यावहारिक दृष्टि से असंभव साबित करना चाहिए | इस तरह,आप उसे या कमसे कम दर्शकों को ये मनवा सकते हैं कि ये लोकतान्त्रिक प्रक्रियाएँ देश के लिए अच्छी हैं |

 

और कृपया नोट करें कि ली गयी आम-नागरिकों के राय की गिनती जनता के नौकरों पर बंधनकारी नहीं होगी | इसीलिए जनता के नौकर कोई विशेष परिस्थितियों में जन-समूह के राय के विरुद्ध और राष्ट्र हित में भी निर्णय ले सकते हैं |

ऐसा आज भी होता है,लेकिन आज,जब जनता के नौकरों के पास कोई तरीका नहीं हैं आम-नागरिकों की राय जानने का | इसीलिए,उनके अधिकतर फैसले जाने-अनजाने में जन-विरोधी होते हैं |

 

इसीलिए,प्रस्तावित लोकतान्त्रिक प्रक्रियाएँ पक्षपात कम करती हैं और आज की अल्प-लोकतान्त्रिक प्रक्रियाएँ पक्षपात को बहुत ज्यादा बढ़ाती हैं |

 

D. कार्यकर्ताओं को क्या करना चाहिए ?

कृपया कुछ प्रस्तावित लोकतान्त्रिक प्रक्रियाएँ जैसे पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली (टी.सी.पी),राईट टू रिकाल-प्रधानमंत्री,राईट टू रिकाल-मुख्यमंत्री,राईट टू रिकाल-जज,आदि चैप्टर 1,6,7,21 www.righttorecall.info/301.h.pdf में देखें |

अकसर पूछे जाने वाले प्रश्न – www.righttorecall.info/004.h.pdf

 

इसीलिए कृपया ये लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं का प्रचार करें और इनकी मांग करें अपने फेसबुक वाल नोट,वेबसाइट आदि में डाल कर,विज्ञापन,पर्चे आदि देकर ,यदि आप असल में हामरे देश के सिस्टम में पक्षपात कम करना चाहते हैं |

 

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कृपया किसी चुनाव का उदाहरण देते समय पूरी परिस्थिति बताएं और ये बताएं कि व्यक्ति के पास क्या वैकल्पिक उम्मीदवार थे वोट डालते समय या चुनने के समय |

 

अभी,यदि एक हिंदू वोटर वोट करता है एक हिंदू प्रत्याशी के लिए या एक हिंदू व्यक्ति एक हिंदू उम्मीदवार को चुनता है,तो केवल इसी आधार पर उसको पक्षपाती नहीं बोल सकते कि उसने मुसलमान प्रत्याशी के लिए वोट नहीं दिया | हमें ये भी देखना चाहिए कि मुसलमान उम्मीदवार ज्यादा अच्छा और कम पक्षपाती था हिंदू उम्मीदवार के तुलना में,जिसको वोटर ने पसंद किया या मुस्लमान उम्मीदवार हिंदू उम्मीदवार जितना ही बुरा या अच्छा था |

 

E. `जो ज्यादा मत पाया वो जीता` (फर्स्ट पास्त थी पोस्ट) सिस्टम का विशेष मामला,मतलब इस सिस्टम में एक व्यक्ति एक उम्मीदवार को वोट दे सकता है

हमारे देश में `जो ज्यादा माता पाया वो जीता` वोट करने का सिस्टम है | उसमें एक व्यक्ति एक उम्मीदवार को वोट दे सकता है और जो उम्मीदवार एक वोट से भी जीतता है,वो विजेता घोषित किया जाता है |

 

इस सिस्टम में,क्योंकि एक वोटर के पास के ही वोट है,वो उस पार्टी के विरुद्ध वोट करता है,जिससे सबसे अधिक नफरत करता है |

तो,यदि वोटर सबसे अधिक कांग्रेस से नफरत करते है,तो वो कांग्रेस के विरुद्ध वोट करेगा एक ऐसी पार्टी के लिए,जो मानी जाती है कि कांग्रेस के विरुद्ध जीतेगी,जैसे भा.जा.पा.,स.पा. आदि | और यदि एक वोटर भा.जा.पा. से नफरत करता है,तो वो भा.जा.पा. के विरुद्ध वोट करेगा ऐसी पार्टी के लिए,जो भा.जा.पा. के विरुद्ध जीत सकती है ऐसी मान्यता हो |

इस तरह,निर्दलीय आदि.,पार्टियां जो नयी हैं और जिनकी जीतने की अवधारणा (मान्यता) नहीं है,उनको पर्याप्त वोट नहीं मिलेंगे | ये सिस्टम नए उम्मीदवारों को दबाता है |

ये समस्या 800 साल पुरानी है और इसका समाधान भी 800 साल पुराना है,जो कि है `पसंद के अनुसार एक से अधिक प्रत्याशी को वोट`,जहाँ हरेक वोटर एक से पांच उम्मीदवारों को वोट देता है,पसंद के क्रम अनुसार वोट दे सकता है |

कृपया चैप्टर 40, www.righttorecall.info/301.h.pdf देखें `पसंद के अनुसार वोट` के लिए |

 

2 comments to पक्षपात,जाती,धर्म आदि. का प्रभाव लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं से कम होता हैं !

  • Aayush Rastogi

    I have a ques,we hav a multi party system where the winning candidate gets around max. 20-30% of the total votes so how can RTR be implemented here bcoz the elected person actually represents a minority segment of the voters &has more people against him than in his favour.

    • Aayush,

      In fact,answer lies in your question! “the elected person actually represents a minority segment of the voters &hence even at the time of his election he has more people against him than in his favour.”So,ironically,a person who gets elected is ‘like’d by only 20-30% people! So,if we give chance to other 70-80% people…to unite their votes against other candidates via a transparent demand procedure…where they can see how vote division helps is winning a bad candidate,they will start supporting a good candidate.

      Please understand one thing,we vote ONCE in 5 years. We can’t change our vote. We can’t check trend the voting of whole constituency. This lack of knowledge stops us from voting the right person…because in such scenario,to stop the person we HATE THE MOST from winning,we vote that person who has best chances to defeat the person we hate…and not to the right one.

      Right To Recall through Transparent Complaint/Demand Procedure solves this problem.

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